
बहुत पीछे छोड़ हैं हम
वो घर आंगन
वो बचपन
जो खिलखिला के हंसा करता था
बच्चों की कमीज पकड़कर
रेल बना करती थी
हमारे हंसने पर
नानी हंसा करती थी
पंजों पर खड़े होकर
खिड़की से बचपन
सड़क देखा करता था
मुटठी में तितलियां बंदकर
इठलाया करता था
बहुत पीछे छोड़ आए
हम वो बचपन...
-सरफ़राज़ ख़ान
वो घर आंगन
वो बचपन
जो खिलखिला के हंसा करता था
बच्चों की कमीज पकड़कर
रेल बना करती थी
हमारे हंसने पर
नानी हंसा करती थी
पंजों पर खड़े होकर
खिड़की से बचपन
सड़क देखा करता था
मुटठी में तितलियां बंदकर
इठलाया करता था
बहुत पीछे छोड़ आए
हम वो बचपन...
-सरफ़राज़ ख़ान
मार्मिक... इसके आगे भी ज़रूर लिखिएगा... कुछ और बयान करिएगा...
ReplyDeleteओह !!!!!!!!! कितना सुन्दर है यह बचपन…………………और कविता भी कितनी अच्छी है ।
ReplyDeleteचिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.......भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनायें.
गुलमोहर का फूल
bahut khoobsurat rachna....
ReplyDeleterachna achchi lagi flow bhi achhca tha umeed hai aesi hi rachnaae aage bhi padne ko milegi..
ReplyDeleteDeepak "bedil'
http://ajaaj-a-bedil.blogspot.com
jandar,shandar,damdar.narayan narayan
ReplyDeleteआपका ब्लॉग अच्छा लगा
ReplyDeleteबचपन की यादें जिंदगी के तपते रेगिस्तान में शीतलता प्रदान करती है ..अच्च्छी रचना
ReplyDeleteबचपन की यादें जिंदगी के तपते रेगिस्तान में शीतलता प्रदान करती है ..अच्च्छी रचना
ReplyDeleteBahut Barhia... aapka swagat hai...isi tarah likhte rahiye...
ReplyDeletePlease Visit:-
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